सुनसान शहर


एक ऐसा शहर
जहाँ इंसान रुपी बुत बसते हैं
जिनके बोलने से नहीं होती कोई आवाज़
चलने से सुनाई देती नहीं पदचाप
मैं उनके समीप गया
तो देखा मैंने उनकी आँखों पर बंधी थी पट्टियाँ
पर वे देख रहे थे सबकुछ
अपनी बंद आँखों से
मैं हैरान परेशान
मैंने कुछ प्रश्न किये ,तो
उनके प्रत्युत्तर को न तो सुन पाया
न ही समझ पाया

उनकी अस्फुट आवाज़
बहुत धीमी लगी मुझे
जैसे सुदूर घाटियों से आती
अस्पष्ट ध्वनि
मैंने फिर कुछ पूछा
तो उन्होंने अपने बेजान हाथों को हिला दिया
अब सबके सब मुझे देखकर
हँस रहे थे निःशब्द हँसी
मैं लौट आया वहाँ से
लौटते हुए उस जगह का सन्नाटा
मेरा सहगामी बना फुसफुसाता रहा
मेरे कानों में
दुनिया बदल गयी है यार !
चैन से जीना चाहते हो, तो
हमारे शहरवासी की तरह बंद कर लो
अपने मुंह ,आँख और कान.