सफर


मेरे और वक्त के बीच
रेस लगती रही
मैं हाँफता - गिरता दौड़ता रहा
उसके पीछे - पीछे
वह झरता रहा
हथेली में रखे बालू की तरह
अंत में मेरी मुट्ठी में वक्त के
दो - चार कण ही आ पाए
वह आगे बढ़ता रहा
मैं पीछे छूटता रहा
फिर भी अदृश्य ताकतों को
समाये अपने भीतर
खंडित सपनों को
जोड़ने की जद्दोजहद में
जीता रहा
ज़माने की तपिश से जलकर
जब भी राख बनने को हुआ
बड़ी होशियारी से
एकाध चिंगारी को बचाये रखा
क्योंकि
जब एहसास होता है
अंधी सुरंगों और वीरान जंगलों में
गुम होने का
तो वहाँ से खुद को तलाशने का
एक नया सफर शुरू हो जाता है ।