प्यार का मतलब


टी.वी. देखता बेटा पूछता है मुझसे
पापा ! आपने किसी से प्यार किया है ?
बेटे के इस प्रश्न से उठने लगी मन में हिलोरें
जैसे अँधेरी गुफाओं में झिलमिलाने लगी हों
सूरज की नन्ही किरणें.

क्या कहूँ बेटे से कि कभी हुआ नहीं
इस शब्द से साक्षात्कार
पर लुभाता रहा यह शब्द शुरू से ही
मुझे औरों की तरह.

पनप नहीं पाया प्रेम का अंकुर
कभी मेरे भीतर .
कि जीवन के सुनहरे वय में
नाचता रहा मैं घिरनी की तरह
अँधेरी सुरंग में.

सेकेंड - हैंड ,साइकिल पर
बदहवासी के आलम में ,टूटी चप्पल
बार - बार सिलवाते
बरस - दर - बरस पिसता रहा मैं
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले.

बेटा उतावला होकर कर रहा है
मेरे प्रश्न का इंतज़ार
मैं उसे अपने से चिपटाकर फुसफुसाता हूँ
मैंने प्यार किया है बेटा आपसे प्यार किया है.

बेटा छिटककर परे हट जाता है
धीरे से बोलता है " तुम बड़े बेवक़ूफ़ हो पापा !
समझ नहीं पाये आज तक प्रेम का मतलब !"
मैं हतबुद्धि ,अवाक्
सिर्फ देखता रह जाता हूँ उसे .