सूख गई नदी


हहराती उछलती - कूदती
वेगवती नदी
हवा के थपेड़ों पर
नाचती - गाती
जाड़े की सुबह में
अलसाये सुख से उनींदी
गदराये यौवन का भार लिए
उल्लास से भरी
उत्ताल तरंगों के साथ
किनारों से भागकर
खेतों ,मैदानों में
बहने को मचलती
पिपासु प्राणियों को
तृप्त करने वाली नदी
कब कैसे सूख गई
किसी को नहीं पता
दरारें पड़ती रही नदी में
भरती गई वह
झरते पत्तों से
आये दिन की घटनाओं से
भरी रहती है अखबारें
पर नदी की अकालमृत्यु पर
नहीं हुई किसी को खबर
मैं जब भी उधर से गुज़रता हूँ
वातावरण में गूँज रहे
नदी के मौन रुदन को सुन
घबरा कर जल्दी से भाग आता हूँ ।