झूठ

दो वर्णों का झूठ
आज बन गया है
लोगों के जीवन का अभिन्न अंग
हम देखते हैं होते
हर वक़्त सच का क़त्ल
और झूठ को सेहरा बांधकर
विजयी भाव से मुस्कुराते हुए
चैन से तो जी नहीं पाते हैं हम
पर विरोध में ज़ुबान भी नहीं खोल पाते हैं
सच तो यह है कि
कहीं -न- कहीं हम सब शामिल है
इसे शक्तिशाली बनाने में
यह संतुष्ट करता है
हमारे खोखले अहं को
आवरण डाल देता है सच्चाइयों पर
अपने विकृत ,घिनौने और
शर्मनाक रूप से
झूठ को सच का जामा पहनाने में
आदमी आज हो गया है कितना प्रवीण
उसके आकर्षक स्वरुप में
फँसते चले जा रहे
हैं हम सबके सब
क्योंकि हम जान चुके हैं
इसके बगैर होता नहीं हमारा काम
और यह सच सिसक रहा है, कोने में
जिसे आउट डेटेड समझकर डाल दिया है
हमने उसे 'डस्टबीन' में .
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