हजारीबाग की झील


झील! तेरा रूप मोह लेता है मेरा मन
तेरी जलधारा है शांत,निर्मल,
मिलती है इससे असीम तृप्ति
स्वच्छ जल के बीचोंबीच खिले हैं
लाल,गुलाबी,श्वेत कमल
सूर्योदय की किरणों का पाकर स्पर्श
बिखेरने लगते हैं ये अद्भुत सौंदर्य
श्वेत कमलपुष्पों पर चमचमाती
लुढ़कती बूंदे.


जगा रही हैं एक स्वप्निल एहसास
थम गया हो जैसे वक्त
मन, प्राण, आत्मा - तृप्त,पूर्ण,परितृप्त
बहने लगी हैं अंतस में
संतोष,शांति और अलौकिक आनंद की धारा
पलकें भूल गई हैं झपकना
कहीं ख़त्म न हो जाए ये जादुई सौंदर्य
लाल,पीले,नीले-बोटों पर बोटिंग करते शहरवासी
तलाशने आतें हैं यहाँ सुकून
झील! तुम भर देते हो उनमें शांति
अपनी जलधारा की मानिंद
मेरा पगलाया मन झूम रहा हैं
हो रहा हैं बेचैन
श्वेत कमल पुष्पों से लिपटने को
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