दोषी तुम सब


दोस्तों! आज हर जगह
बढ़ गई है मेरी पूछ
रास्ते से गुजरते हुए
मुझे अभिवादन करनेवालों की
बढ़ गयी है तादाद
बढ़ती समृद्धि के साथ-साथ
मेरा यश बढ़ता जा रहा है
पर मेरे भीतर के
सूख रहे घाव हरियातें जा रहे है
क्योंकि कागज के चंद टुकड़ों के अभाव में
समझा गया मुझे बेहद नाकारा
जगह-जगह हिकारत और अपमान के दंश
झेलता रहा चुपचाप
व्यंग्य बाणों की चुभन
छेदती रही तन मन को
इन्ही सौगातों ने दिए मुझे गहरे जख्म
आज मेरे बढ़ते यश के कारण
दिखाने आये हो तुम अपना अपनापन
नहीं चाहिए तुम्हारा नकली प्यार
नहीं चाहिए मुझे कोई प्रसिद्धि
यदि यही सिलसिला चलता रहा, तो
मेरे जख्म फिर पनप जायेंगे
और उनसे फूटकर जो मवाद बाहर निकलेगा
उसके दोषी तुम सब होगे.
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